Monday, June 23, 2014

श्राद्ध करना चाहिए या नहीं?





| ओ३म् |

वैदिक सिद्धांतो पर आधारित

"दो मित्रो की बातें" - पंडित सिद्ध गोपाल कविरत्न

 

श्राद्ध करना चाहिए या नहीं?




कमल - मित्र, आज यह बताओ, कि श्राद्ध करना चाहिए या नहीं ?



विमल - श्राद्ध करना चाहिए । जीवित माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, गुरु आचार्य तथा अन्य विद्वानों एवं तत्ववेत्ता विद्वान लोगों की अत्यन्त श्रद्धापूर्वक सेवा करनी चाहिए इसी का नाम 'श्राद्ध' है।



कमल - 'श्राद्ध' तो मरे हुए पितरों का होता है, जीवित का भी कही श्राद्ध होता है?


विमल - पहले यह सोचो 'पितर' शब्द का अर्थ क्या है? पितर का अर्थ है रक्षा करने वाला । रक्षा तो वहीं कर सकता है जो जीवित हो । जीवित ही अपनी सन्तानों को उपदेश दे सकते हैं, और अपने जीवन के अनुभव द्वारा संसार के व्यवहारों का ज्ञान करा सकते हैं । जीवित ही स्वसंतानो की सर्व प्रकार रक्षा कर सकते हैं मरने पर, तो पितर, पितर ही नहीं रहता, क्योंकि पितर न तो आत्मा है और न शरीर है । आत्मा और शरीर के संयोग विशेष का नाम है । जब मृत्यु ने दोनों का सम्बन्ध छुडा दिया तो पितर रह कहाँ गया? यदि आत्मा का नाम पितर हो तो आत्मा नित्य और अविनाशी न रहेगा, नाशवान हो जायगा । क्योंकि पितर मानने पर उसमें आयु का और बड़े का भेद मानना पडेगा । एक आत्मा की उत्पत्ति पहले माननी होगी, दूसरे आत्मा की उत्पति पश्चात माननी होगी। यदि ऐसा न मानोगे तो 'पितर' शब्द का आत्माओ से सम्बन्ध ही न जुड़ेगा । जब सम्बन्ध ही न जुड़ेगा, तो श्राद्ध किया किसका जाएगा? फिर आत्मा को तो सभी लोग अविनाशी मानते हैं, अत: उसमें आयु का और छोटे, बड़े का भेद ही नहीं हो सकता। रहा शरीर, उसको भी 'पितर' नहीं कह सकते । प्रथम तो आत्मा के निकलते ही शरीर की 'शव' संज्ञा हो जाती है, दूसरे यदि शरीर ‘पितर' होता भी तो उसे दबाने या जलाने वाले को भारी पाप लगता। क्योंकि मरने पर या तो शरीर दबाया जाता है या जला दिया जाता है । किसी पितर को जमीन में दबा देना या जला देना कोई पुण्य का काम नहीं हो सकता । परन्तु मृतक शरीर को दबाना या जलाना लोग पुण्य समझते हैं । वास्तव में नाते रिश्ते और पितर आंदि संबन्ध इस संसार से ही सम्बन्ध रखते हैं । मरने पर न कोई किसी का पितर है न कोई किसी की सन्तान है । सब जीव अपना-२ कर्म-फल भोगने के लिए संसार क्षेत्र में आते हैं। शरीर धारण करने पर एक दूसरे से अनेक प्रकार के सम्बन्ध जुड़ जाते हैं । यदि वहीं मरने के पश्चात् भी जीवो के साथ माता-पिता, बहिन-भाई आदि के सम्बन्ध बने रहते हैं तो पुनर्जन्म में माता का पुत्र से, बहिन का भाई से, बेटी का बाप से विवाह होना सम्भव हो जायेगा । इसलिए जीव से माता-पिता आदि का सम्बन्ध नहीं है, जीव और शरीर के संयोग विशेष से सम्बन्ध है । अत: श्राद्ध जीवितों का ही होता है ।


कमल - वर्ष भर में १५ दिन श्राद्ध के निश्चित हैं कभी किसी पितर का श्राद्ध किया जाता है, कभी किसी का किया जाता है । पितर लोग सूक्ष्म शरीर धारण करके श्राद्ध के दिनों में आते हैं और ब्राह्मणों के साथ ही भोजन करते हैं । यदि कभी पितृ लोक से पितर न भी आ सके तो ब्राह्मणों को खिलाया हुआ भोजन उन्हें मिल जाता है ।


विमल - जब मैं बता चुका हूँ कि 'पितर' नाम आत्मा या शरीर का नहीं है, आत्मा और शरीर के विशेष सम्बन्ध का नाम है । फिर यह कहना कि पितर सूक्ष्म शरीर धारण कर भोजन करने आते हैं, सरासर हठ और अविवेक का परिचय देना है । अच्छा चलो थोडी देर के लिए मान भी ले कि पितर सूक्ष्म शरीर धारण कर आते भी हैं, परन्तु यह तो बताओं बिना स्थूल शरीर के वे भोजन कर कैसे लेते है, क्या सूक्ष्म शरीर से भोजन कर सकना सम्भव है? और जब ब्राह्मणों के साथ भोजन करते है तो पहले पितर खाते हैं या पहले ब्राह्मण खाते है? यदि ब्राह्मण पहले खाते है तो पितर झूठा खाते है । यदि दोनो मिलकर खाते है तो एक दूसरे का झूठा खाते हैं । झूठा खाना स्वास्थ्य और सिद्धान्त दोनों दृष्टियों से निन्दनीय है । अच्छा साल भर में १५ दिन ही क्यों निश्चित है? क्या साढे ग्यारह महीने उन्हें भूख नहीं लगती? क्या १५ दिन के भोजन से ही साल भर तक तृप्त बने रहते है? क्या ऐसा हो सकता है तो किसी मनुष्य को १५ दिन खिलाकर साल भर तक बिना भोजन के जीवित रहता हुआ दिखाओ । और १५ दिन भी कहाँ ? श्राद्ध के १५ दिन निश्चित है, इसमें भी केवल एक दिन पितरों के परिवार वाले निकालते हैं । दूसरे यदि ब्राह्मणों को खिलाने से मृतक पितरों को भोजन पहुँच जाता है, तो भोजन करने पर ब्राह्मणों का पेट क्यों भर जाता हैं ब्राह्मणों को तो भोजन करने पर भी भूखा ही रहना चाहिए । जब भोजन उन्होंने पितरों को पहुँचा दिया तो फिर उनका पेट कहाँ भरा? श्राद्ध खाने वाले ब्राह्मणों से जरा यह पूछ लिया करो कि जिन पितरों को भोजन पहुँचाना है, वे हैं कहाँ? साथ ही वह रोगी है या तन्दुरुस्त हैं? यदि वह रोगी ही हो तो फिर उन्हें हलुआ, पुरी और खीर से क्या प्रयोजन है? उन्हें कड़वी दवा और मूँग की दाल का पानी चाहिए । भारी भोजन से तो वह और अधिक रोगी हो जायेंगे। जब किसी को यह पता नहीं कि मृत्यु के पश्चात पितर आत्मा किस योनि में गया है और किस अवस्था में है, तो खीर, पूड़ी ब्राह्मणों द्वारा भेजने का मतलब ही क्या है? यदि श्राद्ध के दिनों में किसी का पितर किसी योनि से स्वयं ही सूक्ष्म शरीर से भोजन करने आए तो जिस योनि से आयेगा उसकी तो मृत्यु हो जानी चाहिए । थोडा और विचारो कि एक आत्मा तत्व-ज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो गया, उसे संसार के भोजन की क्या चिंता? एक आत्मा कर्म वश शेर या भेड़िया बना हुआ है, दूसरा विष्ठा या नाली का कीडा बना हुआ है. इन प्राणीयो का हलुआ और पूडी से क्या काम चलेगा? प्रत्येक प्राणी का अपना भिन्न-२ प्रकार का स्वादिष्ट भोजन है । सबका मनुष्य जैसा भोजन नहीं होता ।देखो! यदि कोई आदमी किसी आदमी के पास पत्र डाल रहा हो; परन्तु उसका पता न जानता हो, सारा मजमून लिखकर बिना पते का पत्र लैटरबक्स में छोड़ दे तो क्या वह उसकी अक्लमन्दी होगी और क्या यह पत्र उस आदमी के पास पहुँच भी जायेगा? कदापि नहीं । फिर बिना पता निशान के ब्राह्मणों को खिलाने से पितरों के पास कैसे भोजन पहुंच जायेगा यह  तो कोरा अन्धविश्वास है । एक व्यक्ति को खिलाने से अगर दूसरे व्यक्ति के पास भोजन पहुँच जाता तो परदेश जाने वाले को भोजन बाँधकर ले जाने की आवश्यकता ही क्या थी ? घर पर ब्राह्मणों को खिला दिया जाता परदेश जाने वाले का पेट स्वत: भर जाता । अतएव मृतक पितरों का श्राद्ध करना बिल्कुल व्यर्थ और अपने आपको धोखा देना है ।


कमल - मित्र, आपने तर्क द्वारा यह सिद्ध किया है कि मृतक पितरो का श्राद्ध नहीँ होता और न एक का दिया दूसरे को मिलता है, परन्तु मुझे यह तो बताओं किसी पुत्र का पिता ऋणी होकर मर जाता है । वह ऋण का पाप अपने ऊपर ले गया है । पुत्र थोड़े समय बाद धनवान हो जाता है और वह पिता का ऋण चुका देता है । अब बताओं मृतक की आत्मा ऋण रुप पाप से मुक्त हुई या नहीं? जब पुत्र ने कर्जा चुका ही दिया फिर पिता ऋणी रहा ही कहाँ ? जब पुत्र द्वारा पिता की आत्मा ऋण के पाप से मुक्त हो सकती है तो पुत्र द्वारा ब्राह्मणों को भोजन कराने पर पिता की भोजन सम्बन्धी तृप्ति क्यों नहीं हो सकती?


विमल - तुम्हें निश्चय पूर्वक जानना चाहिए कि पिता के कर्म का फल पुत्र को और पुत्र के कर्म का फल पिता को कभी नहीं मिलता । मनुष्य जो भी अच्छे बुरे कर्म करता है उसके संस्कार उसका सुख़-दुख रुप 'योग' बनाते है और यह भोग बिना भोगे नहीं टल सकता। लौकिक दृष्टि से पुत्र पिता का ऋण तो चुका देगा, लेकिन जहाँ तक के संस्कार जो पिता की आत्मा पर पडे हैं, उसे पुत्र कैसे मिटा सकेगा ? वह तो उसके बस की बात नहीं । किसी भी मनुष्य के मन पर संस्कार उसी की करनी से पड़ते है और उसी की करनी से धुल सकते हैं । उन्हें दूसरा कैसे धो सकता है? पुत्र लेन-देन की दुनिया का तो इलाज कर लेगा । परन्तु पिता की सूक्ष्म शरीर से सम्बन्ध रखने वाली दुनियाँ का इलाज कैंसे कर सकेगा । यदि यह मान लिया जाय, कि ऋण चुका देने से पिता की आत्मा पर पडे हुए ऋण के संस्कार भी नष्ट हो जाते हैं तो जो पिता करोडों रुपयों की संपत्ति धर्म से कमा कर मर गया है और धर्म से धन कमाने के संस्कार साथ ले गया है परन्तु उसका पुत्र नालायक निकला, उसने पिता के धर्म से कमाए हुए धन को शराब-खोरी और दुराचार आदि में उड़ा दिया । इस पाप से उनकी सर्वत्र निन्दा हो रही है । अब बताओं, उसका फल मृतक पिता की आत्मा को मिलेगा या नहीं? क्योंकि पुत्र ने पिता के धन से ही पाप किया है! यदि पिता के कमाए हुए धन से पाप करने पर पिता की आत्मा को पाप नहीं लग सकता, तो पिता के लिए ऋण को चुकाने से पिता के ऋण  के संस्कार कैसे टल जायेंगे? पिता का ऋण तो पुत्र इसलिए चुकाता है कि जहाँ यह देनदार है, वही लेनदार भी है! जब पुत्र पिता की सम्पति लेने का अधिकारी है तो देने का अधिकारी कौन होगा? जो लेगा वही देगा भी यह तो मनुष्य समाज का एक नियम है, जो चल रहा है । किन्ही-२ देशों में यह नियम नहीं भी है । योरुप के कई देशों में यह नियम नहीं है । उन देशो में संयुक्त परिवार की प्रथा नहीं है । माता-पिता सन्तान का तब तक पालन करते है जब तक उनकी सन्तान स्वतन्त्रता के जीवन व्यतीत करने योग्य नहीं बन जाती | जहाँ योग्य हुई फिर माता-पिता और सन्तान का कोई वास्ता नहीं रहता । न कोई किसी का लेनदार रहता है न कोई किसी का देनदार । वहाँ ऋणं चुकाने न चुकाने का कोई प्रश्न ही नहीं है । वहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्जे का स्वयं ही जिम्मेदार है । इसलिए यह कहना कि ऋण आदि का पिता की आत्मा पर चढ़ा हुआ पाप पुत्र धो देता है, सर्वथा मिथ्या है । इस सृष्टि में कौन किसका ऋणी है और किस में ऋणी है- इसकी व्यवस्था भगवान ही जानता है और वही एक दूसरे का ऋण चुकाने की कर्मानुसार व्यवस्था करता है । सृष्टि के बहुत से काम किसी के लिए साध्य हैं ओंर किसी के लिए साधन हैं । परन्तु यह निश्चित है कि एक के किये हुए कर्म का फल दूसरे को नहीं मिलता। देखो! श्राद्ध के दिनों को 'कनागत' या 'कर्णागत' भी कहा जाता है । एक पौराणिक गाथा है- सुवर्णदान करने वाले कर्ण को स्वर्ग में स्वर्ण ही मिला । जब उसकी भूख दूर न हुई तो उसने १५ दिन छुट्रटी ली और मृत्यु लोक में आकर ब्राह्मणों को भोजन कराया तब स्वर्ग में उसको अन्न खाना सम्भव हुआ । कर्ण लौटकर आने से ही 'कनागत' या 'कर्णागत' नाम पडा । यद्यपि यह कथा सृष्टि क्रम के विरुद्ध होने से मिथ्या है, तथापि उस कथा से यह परिणाम निकाला जा सकता है, कि अपने कर्मों का फल अपने को ही भोगना पड़ता है । कर्ण स्वयं ही स्वर्ग से लौटा  और स्वयं अन्न दान किया, तब अन्न खाने  को मिला, नहीं तो कर्ण के संबंधी मृत्यु लोक में ब्राह्मणों को खिला देते स्वर्ग में कर्ण को प्राप्त हो जाता |



कमल - अच्छा मित्र, अगर मृतक पितरों को भोजन नहीँ मिलता न सही, परन्तु मृतक पितरों के नाम पर भोजन कराने में हानि ही क्या है? इसी बहाने कुछ दान बन जाता है । उनकी यादगार में कुछ न कुछ पुण्य हो ही जाता है |



विमल - हानि क्या? हानि यह है कि वैदिक सनातन मर्यादा का नाश होता है । यदि कहो क्यो! इसलिए कि-'पितृयज्ञ' अर्थात् पितरों का सत्कार ‘नित्य कर्म' के अन्दर आता है । ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, अथितियज्ञ, बलिवैश्वयज्ञ तथा पितृयज्ञ - इन पाँच यज्ञों को यथाशक्ति नित्य ही करना चाहिए । ऐसी वैदिक शास्त्रों की आज्ञा है । यदि मृतक श्राद्ध की १५ दिन की तिथियाँ निश्चित की जाती हैं और उसका नाम 'पितृपक्ष' रखा जाता है, तो नित्य मर्यादा का खंडन हो जाता है । मृतक श्राद्ध तो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार भी नहीं हो सकता क्योंकि पुत्र जब ब्रह्मचर्य आश्रम में होगा, तो पिता गृहस्थाश्रम में होगा । इसी तरह जब पुत्र गृहस्थाश्रम में होगा तो पिता वानप्रस्थ में होगा इसी तरह जब पुत्र वानप्रस्थ में होगा, तब पिता संन्यास में होगा, और जब पिता की मृत्यु का समय होगा तब पुत्र संन्यासी होगा । अब सोचो सन्यासी कैसे मृतक श्राद्ध कर सकेगा? क्योंकि उसने तमाम सकाम भावनाओं का त्याग कर दिया है, तभी तो संन्यासी बना है। संन्यासी से पारिवारिक संम्बन्ध रहता ही नहीं न वह किसी का पिता रहता है न पुत्र, फिर श्राद्ध कैसा? और संन्यासी तो परिवाजक होता है । सदुपदेश करते हुए भ्रमण में कब (किसी तिथि को) और कहाँ मृत्यु हो गई, इसका पता भी पिता पुत्र तथा अन्य घर वालो को कैसे लगेगा? अत: किसी प्रकार भी मृतकों का श्राद्ध सिद्ध नहीं होता । रही दान और पुण्य हो जाने की बात सो पितरों यानी बुजुर्गों की यादगार में खिलाना-पिलाना या दान देना बुरा नहीं, यदि पात्र और कुपात्र को देखकर ऐसा किया जाये । परन्तु जो काम बहाने बनाकर किया जाता है, उसका परिणाम शुभ नहीं निकलता, क्योंकि हृदय में सच्चाई न होने के कारण दान करने वाले की आत्मा पर अच्छा संस्कार नहीं पड़ता । जो मन में हो, वही वाणी पर हो तथा वैसा ही कर्म किया जाये, तब वह पुण्य का काम कहलाता है । बहाने से किया दान न दान है और न पुण्य, पुण्य है। जो भी काम होना चाहिए, सद्भावना और सच्चाई से होना चाहिए और बिना-विचारे दान-पुण्य करना तो संसार में आलसियों और निक्कमे लोगो की तादाद बढ़ाना है, और कुछ नहीं । यदि अपने पूर्वजों की यादगार में बनाना, पिलाना या दान देना आवश्यक है तो क्या आवश्यक है कि क्वार के महीने में ही १५ दिन की निश्चित तिथि में भोजन कराया जाये और दान दिया जाये? और वह भी केवल ब्राह्मणों को ही कराया जाये? क्यो नहीं नंगे, भूखे, लंगड़े, लूले, अपाहिज व्यक्तियों को चाहे वे किसी देश और जाति के हों उन्हें भोजन और दान दिया जावे? पितरों की यादगार में तो बात तब ठीक हो सकती है जब उसी तारीख के आने पर उनकी यादगार में कुछ किया जाये । जैसे रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी उसी तारीख में मनाई जाती है जिस तारीख में उनका जन्म हुआ है । इसी प्रकार पितरो की यादगार उसी तारीख में मनाई जाये जिस तारीख में है मरे हैं तब तो मान लिया जाये कि हाँ यादगार के लिए श्रद्धा दिखाई जा रही है, अन्यथा मृतक श्राद्ध ढोंग ही है ।

कमल - मित्र, आपने इसका खूब विवेचन किया धन्यवाद । अब मैं यह पूछना चाहता हूँ कि इस यज्ञ के करने से क्या लाभ है, लोग घी और सामग्री अग्नि में क्यों फूंक देते हैं?


विमल - इसका उत्तर कल दूँगा ।


| ओ३म् |

यज्ञ और यज्ञोपवीत


 | ओ३म् |

वैदिक सिद्धांतो पर आधारित

"दो मित्रो की बातें" - पंडित सिद्ध गोपाल कविरत्न


यज्ञ और यज्ञोपवीत



विमल - तुम्हारा कल का प्रश्न था, यज्ञ क्यों करना चाहिए ? यज्ञ करने से अनेक लाभ है । यह घी-सामग्री का व्यर्थ फूंकना नहीं है । यज्ञ में घृत और सामग्री जो जलाई जाती है वह वायुमण्डल को शुद्ध बना देती है, वायु के शुद्ध होने से रोगो की सम्भावना नहीं रहती ।



कमल - यज्ञ से वायु कैसे शुद्ध हो है जाती है?



विमल - यज्ञ की सामग्री मे चार प्रकार के पदार्थों का समावेश होता है- रोगनाशक, सुगन्धित, मीठे और पुष्टिकारक । इन पदार्थों से जब यज्ञ किया जाता हैं तो वायुमण्डल में स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने वाले जो कीटाणु होते हैं वे मर जाते हैं । इसी का नाम वायु शुद्ध हो जाना है । इसी यज्ञ द्वारा वर्षा शुद्ध होने की सम्भावना रहती है, जिससे अन्न और औषधियाँ गुणकारी होती हैं, फलत: समस्त प्राणियों का कल्याण होता है ।



कमल - मेरे विचार में तो रोग नाशक और पौष्टिक पदार्थ यदि खाए तो अधिक लाभ हो सकता है । जलाकर पदार्थों को नष्ट क्यों किया जाये? और भला यज्ञ द्वारा वर्षा होने की सम्भावना कैसे हो सकती है?


विमल - मेरा मतलब यह नहीं कि पौष्टिक और रोगनाशक पदार्थ खाये न जायेँ । उन्हें यथोचित खाना भी चाहिए और उनसे यथाशक्ति यज्ञ भी करना चाहिए । जहाँ पदार्थों द्वारा शरीर को पुष्ट करना आवश्यक है वहाँ पदार्थो द्वारा वायु शुद्ध करना और भी आवश्यक है । यदि कोई मनुष्य वायु को शुद्ध नहीं करता तो वह पापी हैं । क्योंकि जब वह वायु को गन्दा करता है तो वायु को शुद्ध करना भी उसका धर्म है । देखो! शरीर से जो कुछ निकलता है गन्दा ही तो होता है- आँख से कीचड़ निकलता है वह गन्दा, कान से जो मैल निकलता है वह गन्दा, मुँह और नाक से जो मैल निकलता है वह गन्दा, पसीना निकलता है वह गन्दा, मल-मूत्र निकलता है वह गन्दा इसी तरह से जो वायु निकलती है, वह गन्दी है । मनुष्य बाहर से अन्न, जल, वायु, फल आदि जो भी ग्रहण करता है वे पवित्र पदार्थ है । पर वे पदार्थ शरीर के भीतर से गंदे होकर निकलते हैं और बाहर की वायु को गन्दा बनाते है । यह मानी हुई बात है कि वायु ही प्राणियों का जीवन है । भोजन और जल के बिना दो चार दिन और कभी कभी इससे भी अधिक समय तक लोग जिन्दा नहीं रह सकते हैं । लेकिन वायु के बिना एक घंटा भी जिन्दा नहीं रह सकते जब वायु प्राणियों की जिन्दगी का आधार है, तो उसका शुद्ध रहना कितना आवश्यक है ? जब वायु अशुद्ध हो जाती है तो कितनी बीमारियों फैल जाती हैं । ये प्लेग और हैजा आदि रोगों के फैलने का कारण गन्दी वायु ही तो है । मरीज के शरीरों के कीटाणु और चूहों के पेट के कीटाणु भी तो वायु में मिल जाते हैं और भयंकर बीमारियों को जन्म देते हैं । इसलिए वायु को शुद्ध बनाने के लिए यज्ञ या हवन से बढ़कर दूसरा उपाय क्या हो सकता है? तुम्हारा जो यह कहना है कि जलाकर पदार्थों को नष्ट क्यों किया जाता है वास्तव में यह ना समझी की बात है । संसार में किसी चीज का नाश नहीं होता केवल रुप बदल जाता है । देखो! पानी जल जाने पर मूर्ख मनुष्य तो समझता है, यह नष्ट हो गया, परन्तु बुद्धिमान जानता है, यह भाप बनकर वायु में मिल गया, नष्ट नहीं हुआ । इसी प्रकार यज्ञ की सामग्री जलकर नष्ट नहीं होती । वह सूक्ष्म होकर वायु का संशोधन करने तथा वायु में मिली हुई भाप को शुद्ध बादल के रुप में जमाने का काम करती है । भाप को जमाने के लिए घी तो 'जामन' का काम करता है । जैसे सैकड़ो मन दूध को जरा-सा दही जमा देता है वैसे ही घृत जिसे सूर्य की तीक्ष्ण से तीक्ष्ण किरणे भी नही सुखा सकतीं, उसको जमाकर वर्षा का कारण बनाता है । अगर लोग विधि और नियम पूर्वक हवन करें, तो निश्चय पूर्वक ठीक समय पर वर्षा हो सकती है । प्राचीन समय में अत्यन्त विधि पूर्वक यज्ञ होते थे, इसलिए खूब वर्षा होती थी, फलत: अकाल नहीं पड़ा करते थे और न आजकल जैसे रोग फैलते थे ।



कमल - क्या घर में सुगन्धित और रोगनाशक पदार्थ रखना नहीं चाहिए? क्या उनसे वायु शुद्ध नहीं हो सकती? जलाने से ही शुद्ध होती है? जलाने में क्या विशेषता है?



विमल - घर में सुगन्धित और रोगनाशक पदार्थ अवश्य रखना चाहिए परन्तु उनसे यज्ञ भी करना चाहिए । यज्ञ करने से पदार्थों की शक्ति करोड़ो गुणा अधिक हो जाती है । इसका प्रमाण यह है, कि  जैसे एक मनुष्य चार मिर्च खा जाता है, उनकी तेजी और कड़वाहट को आसानी से सहन कर लेता है । परन्तु यदि वहीँ मनुष्य जरा सा टुकडा मिर्च का अग्नि में डाल देता है तो उसकी तेजी को वह सहन नहीं कर पाता । खाँसते-२ परेशान हो जाता है बल्कि गली मुहल्ले वालों की भी नाक में दम आ जाता है वे कहने लगते है कि न जाने आज किस कम्बख्त ने मिर्च जलाई है । परन्तु यदि मनुष्य घृत और उत्तम सामग्रियों से हवन करता है तो लोग कहते है, किसी भाई के यहाँ हवन हो रहा है, जिसकी सुगन्धि आ रही है । अब तुम समझ गये होगे कि जिस वस्तु को अग्नि जलाती है उसकी शक्ति कितनी बढ़ जाती है । यज्ञ से बढ़कर उपकार का दूसरा कर्म नहीं हो सकता यज्ञ गुप्त दान है । यज्ञ से जहाँ अपने घरो की वायु शुद्ध होती है, वहीं दूसरो के घरो की भी शुद्धि हो जाती है । वैसे  चाहे कोई किसी का दान न ले । परन्तु यज्ञ द्वारा सब एक दूसरे का दान ग्रहण कर लेते है । क्योंकि यज्ञ-सामग्री सूक्ष्म रुप में वायु द्वारा सबके घरो में पहुचती है और रोगाणुओ को नष्ट करती है ।



कमल - संसार की दुर्गन्ध और रोग के कीटाणुओं को तो सूर्य की रश्मियाँ ही नष्ट कर देती है फिर यज्ञ करने की क्या आवश्यकता है? जो काम मनुष्य के किये बिना हो रहा है, उसमें व्यर्थ की मगजपच्ची क्यों की जाए ?



विमल - मै पूछता हूँ कि जब सूर्य और चन्द्र मनुष्य के बिना निकाले ही निकल रहे हैं, तो फिर मनुष्य प्रकाश के लिए बिजली, गैस, लालटेन और दीपक से क्यों काम है रहा है? सृष्टि में फल, वनस्पति, मेवे आदि लगातार उत्पन्न हो रहे है फिर मनुष्य खेती करके अनाज क्यों उत्पन्न कर रहा है? शरीर में स्वयं ही रोगो के दूर होने का भगवान् ने प्रबन्ध कर रखा है । हृदय बराबर रक्त शुद्ध कर रहा है, पेट की अन्तडियाँ बराबर भोजन और जल का विभाजन कर रही है तथा क्रमानुसार प्रत्येक इन्द्रिय को उत्तम हिस्सा देकर गन्दा हिस्सा बराबर शरीर से बाहर निकाल रही है । रोगों को दूर होने का समुचित प्रबन्ध है, फिर क्यों मनुष्य औषधियों का प्रयोग कर रहा है, और क्यों परहेज से रहने का यत्न कर रहा है? वास्तव में सृष्टि के यह नियम ही तो मनुष्य को अपने अनुकूल चलाने की प्रेरणा करते है, ताकि मनुष्यों का कल्याण हो! सृष्टि-नियम यह बतलाते है कि जैसे सूर्य अपनी रश्मियों से गन्दगी को दूर कर रहा है, वैसे ही गन्दगी को तुम दूर करो । जैसे सूर्य संसार की वायु शुद्ध कर रहा है, वैसे ही वायु को तुम शुद्ध करो । यह यज्ञ आदि परोपकार के काम करने में सृष्टि नियम प्रबल प्रमाण का प्रत्यक्ष परिचय दे रहे हैं ।


कमल - अच्छा, यज्ञ करते हुए मन्त्र क्यों पढ़ते हैं?



विमल - मंत्रो में यज्ञों का लाभ वर्णन किया है, उन्हें श्रोतागणों को सुनाया जाता है । दूसरे मन्त्र कण्डस्थ रहते हैं फलत: वेद की रक्षा होती है । तीसरे जिस चीज को बार-बार पढ़ा जाता है उसमें श्रद्धा भी हो जाती है, श्रद्धा हो जाने पर कार्य में प्रवृत्ति बनी रहती है । कार्य में प्रवृत्ति बनी रहने से आत्मा पर 'कर्मकाण्ड' के उत्तम संस्कार पड़ते रहने के कारण मनुष्य अपने जीवन के उददेश्य तक पहुंच जाता है ।



कमल - अच्छा मित्र, यह बात तो समाप्त हुई । अब यह बताओ, यज्ञोपवीत पहनने से क्या लाभ है? ये धागे लोग क्यों गले में डाले रहते हैं? कोई तीन धागे डाले रहता है, कोई छ: डाले रहता है, इसमें क्या रहस्य है?



विमल - यज्ञोपवीत को  'प्रतिज्ञासूत्र' या 'व्रतबन्ध' भी कहा जाता है । इसको पहिन कर मनुष्य कर्तव्य पालन करने का व्रत लेता है । वास्तव में यज्ञोपवीत के तीन ही धागे होते है । यह धागे एक 'ब्रह्मगाँठ' में बंधे रहते है । यह तीनों धागे इस बात की सूचना देते है कि प्रत्येक मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण है अर्थात् देवऋण यह है कि जिस ईश्वर ने मनुष्यों को जन्म दिया है उसकी स्तुति, प्रार्थना, उपासना, नित्य नियम पूर्वक करे । जो व्यक्ति संध्या और हवन नहीं करता वह 'देवऋण' से मुक्त नहीँ हो सकता । वैसे संध्या हवन करने में ईश्वर का कुछ भला नहीं है, अपना ही भला है । क्योंकि संध्या से आत्मिक उन्नति होती है और हवन से शारीरिक उन्नति होती है । परन्तु जो मनुष्य उपकार करने वाले का उपकार नहीं मानता, वह 'कृतघ्न' कहलाता है । कृतघ्न मनुष्य किसी का भी विश्वासपात्र नहीं बन सकता । अतएव एक धागा संध्या और हवन अर्थात् "देवऋण" से उऋण होने की प्रतिज्ञा कराता है। दूसरा धागा 'पितृऋण' अर्थात माता-पिता की सेवा करने की प्रतिज्ञा कराता है। तीसरा धागा 'ऋषिऋण' से मुक्ति होने की प्रतिज्ञा कराता है । अर्थात् जिस गुरु या आचार्य ने विद्याध्ययन एवं अपनी शिक्षाओं और सदुपदेशो से सन्मार्ग दिखाया है, उसकी सेवा सदैव करनी चाहिए, यह सिखाता है । और भी अनेक सूक्ष्म बाते हैं जिनकी प्रतिज्ञा ये 'त्रिसूत्र' या जनेऊ कराता है । जैसे ज्ञान, कर्म और उपासना ये तीन साधन ईश्वर प्राप्ति के है । यज्ञोपवीत पहन कर मनुष्य कहता है कि मै ज्ञान, कर्म, उपासना से ईश्वर की प्राप्ति करुँगा, मैं जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं को पूर्ण करके 'तुरीय' अवस्था में प्रभु से मेल करुँगा  प्रकृति के सत्, रज, तम तीनों गुणों से यथावत् लाभ उठाता हुआ जीवन के उददेश्य परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ूंगा । मैं बडे छोटे और बराबर वालों से ठीक-२ बर्ताव करुँगा। अर्थात बडों का आदर, बराबर वालों से प्रेम, और छोटों पर दया करुँगा । ऐसी अनेक महत्वपूर्ण बातों का प्रतिज्ञाबद्ध आदर्श यज्ञोपवीत सामने रखता है ।


कमल - तुम्हारा यह कहना कि यज्ञोपवीत के तीन ही धागे होते हैं झूठा है । मैंने सैकडों को छ: धागों का पहनते हुए देखा है, दूसरे जितनी भी प्रतिज्ञा की बाते तुमने कही है, उन्हें वैसे भी याद रखा  जा सकता है। इन धागों के बन्धन में मनुष्य को क्यों बांधा जाये?



विमल - यह मै मानता हूँ तुमने छ: धागों का यज्ञोपवीत पहने हुए लोगों को अवश्य देखा होगा । परन्तु वास्तव में तार तीन ही होते हैं। प्राचीन काल में यज्ञोपवीत स्त्रियाँ भी पहनती थी और वेदादि सत्शास्त्रो का अध्ययन करती थी, परन्तु कालचक्र के प्रवाह से स्वार्थी पुरुष समाज ने स्त्रियों के यज्ञोपवीत पहनने और वेदाध्ययन करने का अधिकार छीन लिया । जो स्त्रियों का यज्ञोपवीत था वह भी अपने ही गले में डालने लगे । परन्तु अब ऋषि दयानन्द की कृपा से स्त्रियों को पुन: यज्ञोपवीत और वेदादि शास्त्र के अध्ययन करने का अधिकार प्राप्त हो गया है । फलत: लाखों आर्य भाई और बहिनें 'त्रिसूत्र' पहनने लगे है । कोई भी आर्य पुरुष छ: तारो का जनेऊ नहीं पहिनता । हाँ, जो स्त्रियों की उन्नति तथा शिक्षा के विरोधी है, वे छ: तार का जनेऊ अवश्य पहनते है । रही यह बात कि जितनी प्रतिज्ञा की बातें हैं उन्हें वैसे ही याद कर लिया जाये, यह खाँमखाँ गले में तारो का बन्धन क्यो डाला जाये? भाई यह तो वह बात हुई कि पुलिस के सिपाही को उसके कर्त्तव्य सम्बन्धी सभी बात सिखा दी जायें, परन्तु उसे पहिनने को वर्दी और चपरास न दी जाये। वर्दी और चपरास के बन्धन से सिपाही का फायदा ही क्या है? मै पूछता हूँ कि सिपाही के चपरास और वर्दी न पहिनने पर पब्लिक के आदमी में और उसमें क्या अन्तर रहेगा? और यह जाना भी कैसे जायेगा, कि यह सिपाही है? लोग उसका रोब भी किस तरह मानेंगे? पता चला, जिस तरह सिपाही को कर्तव्य सम्बन्धी बातें याद  रखना जरूरी है, उसी तरह वर्दी और चपरास भी पहिनना जरुरी है । यहीं दृष्टान्त जनेऊ पर भी लागू होता है। जहाँ द्विजो को कर्तव्य सम्बन्धी प्रतिज्ञायें याद रखना जरुरी है, वहाँ द्विजत्व का चिंह यज्ञोपवीत भी धारण करना जरुरी है ।



कमल - अच्छा, लोग इसे कान पर क्यों चढ़ा लेते है ।



विमल - मल मूत्र त्याग करते समय कान पर चढ़ा लेते है ।



कमल - यह क्यो? 


विमल - इससे एक लाभ रहता है, वह यह कि जब तक कान पर जनेऊ चढ़ा रहता हैं तब तक यह बात याद बनी रहती है कि मुझे हाथ मुँह आदि शुद्ध करना है । जहाँ हाथ मुँह आदि शुद्ध किया, फिर कान से उतार देते है इस दृष्टि से जनेऊ पवित्रता की याद दिलाने का भी एक साधन बन जाता है ।



कमल - क्या कान पर जनेऊ चढ़ाना बहुत आवश्यक है?



विमल - बहुत आवश्यक नहीं, परन्तु यदि कान पर चढ़ा लिया जाये तो कोई हर्ज भी नहीं बल्कि इससे तो शुद्धता की याद बनी रहती है, जैसा कि मैं कह चुका हूँ। हाँ, एक बात है यदि जनेऊ बहुत नीचा हो, तो मूत्र मल आदि में भ्रष्ट होने की सम्भावना रहती है । ऐसी अवस्था में तो कान पर चढ़ाना ही आवश्यक है ।



कमल - अच्छा, लोग चोटी क्यों रखते हैं और संध्या करते समय लोग उसमें गाँठ क्यों देते है?



विमल - 'चोटी' का शब्द ही यह बतला रहा है कि मनुष्य के शरीर में यह स्थान और यह चीज सबसे ऊँची है । जहाँ चोटी रक्खी जाती है उस स्थान को 'ब्रह्म-रन्ध्र' कहते हैं । विद्वानों ने इस स्थान को ब्रह्म का गुप्त कोष कहा है । योग की परिभाषा से इसे 'सत्य' कहते हैं । इसलिए वैदिक संध्या में 'सत्यं पुनातु पुन: शिरसि' आया है । संध्या करते हुए गायत्री मन्त्र का उच्चारण करके सर्वप्रथम चोटी में गाँठ देते है, इसका अर्थ ही यह है कि उपासक अपनी आत्मा को परमात्मा के साथ गाँठ देकर ऐसे जोड़ रहा है जैसे कन्या विवाह के समय अपने पति के वरने के अन्तिम चिन्ह के रुप में उस प्रतिज्ञा की अन्तिम पूर्ति को कार्य रुप में करती हुई अपने पल्ले को पति के पल्ले के साथ एक गाँठ द्वारा जोड़ लेती है । यही गाँठ विवाह की प्रतिज्ञाओं का अन्तिम बन्धन है। वास्तव में चोटी धर्मं का चिन्ह हैं।



कमल - मुझे तो इसकी संक्षेप में उपयोगिता बता दो कि हिन्दू चोटी इसलिए रखते हैं, तथा और लोग क्यों नहीं रखते ?



विमल - मै कह चुका हूँ कि यह आर्य लोगों के धर्म का चिन्ह है । चोटी का अर्थ ही शिखा अर्थात् ऊँचा है, वैदिक धर्मं ईश्वरीय होने के कारण चोटी का धर्म है। इसलिए चोटी को धर्म चिन्ह के रुप में रखते हैं । जिनका वेदों का धर्म नहीं है, वह चोटी कैसे रखें? चोटी के धर्म वाले ही तो चोटी का निशान रखेंगे ।



कमल - अच्छा मित्र, अब तो जाता हूँ कल एक बहुत आवश्यक विषय पर वार्तालाप करूँगा | 


| ओ३म् |

वर्ण व्यवस्था जन्म से या कर्म से?


| ओ३म् |

वैदिक सिद्धांतो पर आधारित

"दो मित्रो की बातें" - पंडित सिद्ध गोपाल कविरत्न


वर्ण व्यवस्था जन्म से या कर्म से?



कमल - मित्र, आज यह बताओ, जाति जन्म से या कर्म से?



विमल - जाति जन्म से है, कर्म से नहीं।



कमल - एक दिन तो तुम कह रहे थे, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कर्म से होते है, आज जन्म से बता रहे हो ।



विमल - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तो गुण कर्म से ही होते हैं, परन्तु जाति जन्म से होती है ।



कमल - इसका क्या मतलब हुआ? क्या ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जाति नहीं हैं ।



विमल - नहीं, यह तो वर्ण हैं । जाति तो वह है जो जन्म से मृत्यु पर्यन्त रहती है, जिसमें परिवर्तन नहीं होता जैसे मनुष्य जाति, पशु जाति | मनुष्य पशु नहीं बन सकता और पशु मनुष्य नहीं बन सकता जो जिसकी जाति है वही रहेगी!



कमल - तो क्या वर्ण बदल जाता है?



विमल - वर्ण क्यों नहीं बदलेगा? वर्ण का तो अर्थ ही स्वीकार किया हुआ है । 'वर्णो स्वीकार:' जब वर्ण गुण कर्मों से स्वीकार किये है, तो जैसे गुण-कर्म होंगे वैसा ही वर्ण हो जायेगा ।



कमल - तो क्या ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, सारे वर्ण ईश्वर ने नहीं बनाये हैं?



विमल - ईश्वर ने तो जातियाँ बनाई हैं । हाँ, मनुष्य समाज को गुण-कर्मानुसार वर्ण बनाने का उपदेश वेद द्वारा भगवान् ने अवश्य दिया है ।



कमल - कौन-२ से गुण कर्मों से ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य आदि वर्ण बनते हैं?




विमल - वेद ने तो शरीर का दृष्टान्त देकर समझाया है-

ब्राह्मणोंस्य मुखमासीद बाहू राजन्य: कृत: ।
ऊरु तदस्य यद्वैश्य पद्भ्याम शूद्रोजायत || यजु० ३१११


अर्थात् समाज रुपी शरीर का ब्राह्मण 'मुख' है क्षत्रिय 'बाहु' है, 'पेट' वैश्य है और 'शूद्र' 'पैर' है । इस दृष्टान्त से यह बात निकलती है कि शरीर के अंगों में मुख, ज्ञान प्रधान अंग है क्योंकि मुख में कान, नाक, आँख, जिव्हा आदि सारी ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । दूसरे सर्दी, वर्षा आदि ऋतुओं में सारा शरीर वस्त्रो से ढक लिया जाता है, परन्तु मुख सदैव खुला रहता है, वह सर्दी, गर्मी आदि ऋतुओं के कष्ट को बराबर सहन करता है । तीसरे मुख जो भी ग्रहण करता है, वह अपने पास नहीँ रखता, दूसरे को दे देता है । इससे सिद्ध होता है की जिस व्यक्ति में ज्ञान, तप और त्याग है, वह 'ब्राह्मण' है । बाहुओं को 'क्षत्रिय' बतलाने का मतलब यह है कि बाहु अर्थात् हाथ बल प्रधान होते है, जब कोई शरीर पर आक्रमण होता है, तो हाथ सबसे पहले शरीर की रक्षा करते हैं । अतएव जो न्याय पूर्वक अपने बल से प्रजा की रक्षा करे वह क्षत्रिय है । पेट को वैश्य कहने का मतलब यह है, पेट सारा भोजन अपने अन्दर एकत्र करता है और फिर उसका ठीक-२ पाचन करके प्रत्येक अंग को यथा योग्य हिस्सा देता है । अत: जो धन को एकत्र करके मनुष्य समाज में यथोचित नियमानुसार वितरण करता है, वह वैश्य है । पैरों को 'शूद्र' इसलिए कहां है कि- पैर प्रथम तो सारे शरीर का बोझ उठाये हुए हैं, दूसरे परिश्रम करके, सिर, पेट, हाथ आदि अंगों को उसी स्थान पर पहुंचा देते है, जहाँ जाना है । उनके पास 'ज्ञान' 'बल' और 'धन' तो है नहीं, जो उससे कार्य कर सकें । उनके पास परिश्रम करने की शक्ति है इससे वे समाज रुपी शरीर की सेवा करते हैं । इससे निष्कर्ष यह निकला जो सेवा प्रधान हैं, 'शूद्र' है । ब्राह्मण ज्ञान से, क्षत्रिय बल से, वैश्य धन से और शूद्र सेवा से मनुष्य समाज की सेवा करे  यही वर्णो का वर्णत्व है ।

कमल - मै तो देखता हूँ ज्ञान, बल, धन और परिश्रम प्रत्येक मनुष्य में थोड़ा बहुत पाया जाता है । इस दृष्टि से तो प्रत्येक मनुष्य चारों वर्ण वाला है । फिर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि की व्यवस्था बन कैंसे सकती है?



विमल - यह ठीक है प्रत्येक मनुष्य में चारों वर्णो की योग्यता है, परन्तु जिस मनुष्य में जो चीज मुख्य है उसके आधार पर वर्ण माना जाता है । प्रत्येक मनुष्य में कोई न कोई एक मुख्य बात अवश्य है । कोई धनवान है, कोई गुणवान् हैं, कोई बलवान् है, कोई सेवक है । उसी के आधार पर उसका वर्ण है । वेद ने तो बीज रुप से अलंकारिक वर्णन कर दिया है, बुद्धिमानों ने उस अलंकार का रहस्य निकाला है ।



कमल - जरा स्पष्ट रुप से समझाओ, कौन-२ से काम करने वाला कौन-२ से वर्ण में आता है?

विमल - जिसमें शम, दम, तप, पवित्रता, शान्ति, कोमलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता है, वह व्यक्ति 'ब्राह्मण' है । जिसमें वीरता, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से न भागने का स्वभाव तथा दानशीलता और न्यायकारी ईश्वर की तरह न्याय करने का भाव है वह 'क्षत्रिय' है । जो कृषि, गोरक्षा, दान और वाणिज्य व्यवसाय में निपुण है वह 'वैश्य' है और जो केवल अपने शरीर से सेवा करने में निपुण है, वह 'शूद्र' है।



कमल - यदि वर्णो को जन्म से माने तो वया आपत्ति है? करोड़ो लोग वर्ण जन्म से मानते हैं ।



विमल - जो लोग जन्म से वर्ण मानते है, उनके अनुसार भी वर्ण कर्म से ही सिद्ध होता है । क्योंकि उनके मत में भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीनों वर्णो को 'द्विज' माना जाता है । शूद्र को एकज माना जाता है । द्विज का अर्थ है जिसके दो जन्म हो । "द्वाभ्यां जायते इति द्विज:" संसार में जिनके भी दो जन्म होते हैं, वे 'द्विज' कहलाते हैं जैसे दाँत, या पक्षी । दांत 'द्विज' क्यो कहलाते है? इसलिए इनके दो जन्म होते है । बच्चे के दूध के दाँत टूट जाते है दुबारा उनका फिर जन्म होता है । पक्षी 'द्विज' इसलिए कहाते हैं कि उनके भी दो जन्म होते हैं । पहले तो अण्डे का जन्म होता है । फिर अण्डे से पक्षी का जन्म होता है । अब सोचना यह है कि यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य द्विज हैं तो दूसरा जन्म इनका कौन सा है? माता-पिता के यहाँ जन्म से तो सभी'एकज़' अर्थात् एक जन्म वाले है फिर 'द्विज' अर्थात् दो जन्म वाले कहाँ से बने? उत्तर मिलता है, माता-पिता के बाद आचार्य द्वारा जो जन्म मिलता है, उससे द्विज बने । आचार्य ने योग्यता अनुसार उनको वर्ण प्रदान किया है । वास्तव में प्राचीन काल में वर्ण के बनाने की यहीं व्यवस्था थी । सभी अपने पुत्रो को गुरुकुल में भेज देते थे । बाद में पढ़ लिखकर जैसी उऩमें योग्यता होती थी, उसी के अनुसार आचार्य उन्हें वर्ण की उपाधि दे देता था ।



कमल - क्या ब्राह्मण का लड़का ब्राह्मण और शूद्र का लड़का शूद्र नही होता?



विमल - यह कोई विशेष आवश्यक नहीं कि ब्राह्मण का लड़का ब्राह्मण और शूद्र का लड़का शूद्र ही हो । जैसे कि यह आवश्यक नहीं डाक्टर का लड़का डाक्टर या मास्टर का लड़का मास्टर और वकील का लड़का वकील हो। क्योंकि जब पिता जैसी लड़के में योग्यता नहीँ होगी तो वह अपने पिता के पद पर पहुँच कैसे सकेगा ?


कमल - मै तो यह समझता हूँ जैसे गधे से गधा और घोड़े से घोड़ा, आम से आम और सेव से सेव उत्पन्न होता है वैसे ही ब्राह्मण से ब्राह्मण और शूद्र से शूद्र उत्पन्न होता है ।



विमल - मैं पहले कह चुका हूँ कि गधा, घोडा आदि जातियाँ हैं । जाति से जाति उत्पन्न होती है। परन्तु ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि तो वर्ण है वह तो कर्मानुसार बदलते ही रहते हैं । जातियाँ कभी नहीं बदलती । गधे, घोड़े नहीं बन सकते । जो हैं वही रहेंगे ।


कमल - मेरे विचार में तो वर्ण भी नहीं बदलते । भगवान् ने जो जिसका वर्ण बना दिया है वही रहता है ।

विमल - यह बात खूब कही कि वर्ण नहीं बदलता है! अच्छा यह तो बताओ यदि वर्ण नहीं बदलता तो कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय, मुसलमान या ईसाई कैंसे बन जाता है? इस भारत के आठ करोड़ मुसलमानो में ८० फीसदी ऐसे है जो हिन्दु से मुसलमान बने है और इनमें चारों वर्ण के लोग मौजूद है, ये कैसे बदल गये? अगर वर्ण भगवान के बनाये हुए होते तो ये लोग कभी बदल सकते थे? कदापि नहीं । जो चीज भगवान की बनाई हुई होती है उसमें परिवर्तन होता ही नहीं । देखो भगवान का बनाया हुआ आम कभी सेब बन सकता है? भगवान का बनाया शेर कभी हाथी बन सकता है? दुनियाँ की किसी चीज को लो जो भी भगवान की बनाई हुई है वह अपरिवर्तनशील है । यदि भगवान का बनाया हुआ ब्राह्मण होता तो ब्राह्मण ही रहता और मुसलमान मुसलमान ही रहता । परन्तु ऐसा नहीं होता गुण-कर्म के बदल जाने से न तो ब्राह्मण ब्राह्मण रहता है और न मुसलमान मुसलमान रहता है ।



कमल - मित्र, ब्राह्मण तो ब्राह्मण ही रहता है, चाहे वह भले ही मुसलमान या ईसाई हो जाये । हाँ, इतना कहा जा सकता है कि वह मुसलमान या ईसाई होने पर उस काम का नहीं रहता जिस काम का रहना चाहिए। जैसे लड्डू के नाली में गिर जाने पर लड्डू रहता है पर वह खाने के काम का नहीं रहता।

विमल - वाह, तुमने क्या अच्छा तर्क किया है, मुसलमान और ईसाई होने पर भी ब्राह्मण ही रहते है । अच्छा अगर यह बात है, तो फिर उसे ब्राह्मण ही क्यो नहीं कहते हो, मुसलमान या ईसाई क्यों कहते हो? अथवा 'मुसलमान ब्राह्मण' या 'ईसाई ब्राह्मण' क्यो नहीं कहते हो? लड्डू की भी खूब मिसाल दी! यह तो बताओ नाली में गिर जाने पर लड्डू तो काम का नहीं रहता परन्तु किसी पिता का पुत्र नाली में गिर पड़े तो वह पुत्र भी पिता के काम का रहता है, या नहीं? किसी की गाय या भैंस नाली में गिर पड़े तो वह भी काम की रहती है या नहीं अच्छा, और लो यदि तुम्हारी यह घड़ी ही नाली में गिर पड़े तो फिर यह तुम्हारे काम की रहेंगी या नहीं? यह तो ठीक है नाली में गिर जाने पर लड्डू लड्डू ही रहता है । क्योंकि जिसकी जैसी शक्ल बनी हुई है वह तो रहेगी ही। परन्तु यह आवश्यक नहीं कि हर एक चीज नाली में गिर जाने से काम की नहीं रहती । लड्डू खाने के काम का नहीं रहता, परन्तु रुपया गिर जाने पर सदा काम का रहता है । लड्डू का उदाहरण वर्णो पर नहीं घटता जातियों पर घटता है । जैसे नाली में गिर जाने पर लड्डू है लड्डू ही रहेगा, जलेबी नहीं बन सकता, वैसे ही नाली में गिर जाने पर मनुष्य, मनुष्य ही रहेगा गधा, घोड़ा नहीं बन सकता । जो जिसकी आकृति बनी हुई है, वह कैसे बदल सकती है? जाति और वर्ण में यही तो अन्तर है कि जाति आकृति से जानी जाती है और वर्ण गुण कर्मों से जाने जाते है ।



कमल - तो क्या वर्ण शक्ल से नहीं जाने जाते?



विमल - कभी नहीं | वर्ण गुण-कर्मो से जाने जाते हैं। यदि शक्ल से जाने जाते, तो फिर किसी से पूछने की क्या जरुरत थी कि "तुम्हारा वर्ण क्या है?" तुम ब्राह्मण हो या क्षत्रिय हो? यही तो एक बात है जो प्रमाणित करती हैं, कि वर्ण जन्म से नहीं, गुण कर्म से है । यदि ईश्वर ने जन्म से वर्ण बनाये होते तो उसकी पहिचान के लिये उनमें कुछ न कुछ भेद अवश्य करता । जितनी ईश्वर की बनाई चीजें हैं, उनकी पहिचान के लिए सबमें आकृति भेद पाया जाता है । एक लाइन में हाथी, घोडा, ऊँट, भैंसे, हिरन, सूअर, तोता, कबूतर आदि जानवरों को खड़ा कर दो, बच्चा भी उनकी सूरतों को देखकर बता देगा, 'यह गाय हैं' 'यह घोड़ा हैं' 'यह हाथी है' एक जगह सेब, सन्तरा, आम, अमरुद, अनार आदि फल रख दो । प्रत्येक मनुष्य उनकी शक्ल को देखकर बतला देगा कि यह आम है, यह अनार है, यह सन्तरा है । परन्तु यदि चारों वर्णो के दो हजार मनुष्यों को एक लाइन ने खड़ा कर दो, अपरिचित मनुष्य उन्हें कभी न बता सकेगा यह कौन-२ वर्ण के आदमी हैं ।



कमल - क्या ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, रंग-रुप से बिलकुल नहीं पहिचाने जाते? मैंने बड़े-२ विद्वानों से सुना है, वर्ण ईश्वर के बनाये हुए हैं ।



विमल - फिर वही बात! मैं कह चुका हूँ, वर्ण कर्म से होते है जन्म और रंग-रुप से नहीं । यदि रंग-रुप से होते तो उसकी पहिचान के लिए ब्राह्मण का रंग सफेद होता, क्षत्रिय का लाल होता वैश्य का काला होता । परन्तु ऐसा नहीं है । काश्मीर के भंगी और मद्रास के ब्राह्मण का मुकाबिला करके देख लो भंगी गोरा और खूबसूरत मिलेगा, ब्राह्मण तवे से भी ज्यादा काला मिलेगा । व्यंग में लोग कहते हैं, कि एक दफा काले तवे और मद्रास के ब्राह्मण में मुकदमा चला गया ब्राह्मण कहता था मैं ज्यादा काला हूँ और तवा कहता था मैं ज्यादा काला हूँ। आखिर जज ने फैसला ब्राह्मण के हक में ही दिया । देखो! क्वेटा और बिहार के भूकम्प में सैकडों छोटे-२ बच्चे मलवे में नीचे दबे हुए निकले उन बच्चो में सभी वर्णों के बच्चे थे । उनके   माँ-बाप, सगे सम्बन्धियो का कुछ पता नहीं चला । बताओ वे बच्चे किस वर्ण में गिने जायेंगे? अगर रुप रंग और शक्ल सूरत के आधार पर वर्ण होता तो गाय, भैंस के बच्चों की तरह वे पहिचान लिये जाते या नहीं? तुमने बड़े-२ विद्वानों से सुना होगा, मैं कब कहता हूँ कि नहीं सुना होगा । सुनने में तो सभी बातें आती हैं, परन्तु ठीक वही होती है जो "दो और दो चार" की तरह सत्य होती है । देखो, ईश्वर यदि जन्म से वर्ण बनाता तो और कुछ भेद न भी करता मगर इतना तो अवश्य ही कर देता कि ब्राह्मण का शरीर ८ फुट का क्षत्रिय का ६ फुट का, वैश्य का ४ फुट का और शूद्र का तीन फुट का बना देता ताकि पहचानने में सुविधा हो जाती, या फिर शरीर के बोझ में ही कमीबेशी कर देता । ब्राह्मण का शरीर ४ मन का, क्षत्रिय का ३ मन का, वैश्य का २ मन का, और शूद्र का १ मन का बना देता ताकि लोग वर्णों का भेद जान तो लेते । परन्तु उसे तो मनुष्य की उन्नति के लिए गुण कर्मानुसार वर्ण व्यवस्था बनाने का उपदेश देना था, यह उन चीजो में भेद करता ही क्यों?



कमल - अच्छा, इन ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों में सबसे बड़ा वर्ण कौन सा हैं ?



विमल - इन वर्णो में न कोई बड़ा है और न ही छोटा है । अपने-२ कर्तव्य कर्मों में सब बड़े हैं। जैसे शरीर के अंगों में, जब विचार विवेक का अवसर आता है उस समय शिर बड़ा है, जब रक्षा करने का समय आता है तब 'हाथ' बड़े है जब भोजन को पकाने और शरीर के प्रत्येक अंग को यथायोग्य भोजन का सार पहुंचाने का अवसर आता है तब पेट बड़ा है और जब परिश्रम पूर्वक शरीर के भार को उठाने और आने-जाने का अवसर होता है, तो पैर बड़े हैं । इसी प्रकार मनुष्य समाज की 'ज्ञान' से सेवा करने का जब समय आता है तो उस समय ब्राह्मण बड़े हैं । 'बल' से सेवा करने का समय आता है तो क्षत्रिय बड़े है । 'धन' से सेवा करने का समय आता है तो वैश्य बड़े हैं और शरीर से सेवा करने का समय आता है, तो शूद्र बड़े हैं | वैसे स्वतन्त्र रुप से वर्णों में एक दूसरे से न कोई बड़ा  है और न छोटा है ।



कमल - मेरा तो विचार यह था कि वर्णो में ब्राह्मण सबसे बड़े हैं उससे छोटे क्षत्रिय, उससे छोटे वैश्य और उससे छोटे शूद्र हैं?



विमल - नहीं यह बात नहीं है । स्वतन्त्र रुप से ब्राह्मण-ब्राह्मणों में, क्षत्रिय-क्षत्रियो में, वैश्य-वैश्यों में और शूद्र-शूद्रो में तो योग्यतानुसार छुटाई-बड़ाई हो सकती है, परन्तु स्वतन्त्र रुप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि वर्णो में छुटाई-बड़ाई का सम्बन्ध कैसे हो सकता है? जैसे दो हलवाई है । एक ५) रोज का कारीगर है, दूसरा १०) रोज का कारीगर है । अब इन दोनों में तो छुटाई-बड़ाई मानी जा सकती है कि एक घटिया कारीगर है दूसरा बढिया कारीगर है । परन्तु कोई व्यक्ति कहने लगे कि हलवाई से दर्जी बड़ा है क्योंकि १५) रोज का कारीगर है भला यह क्या बात हुई? हलवाई और दर्जी में तुलना क्या है हलवाई अपने क्षेत्र में बड़ा है दर्जी अपने क्षेत्र में बड़ा हैं। अपने-२ कर्तव्य कर्मों में दोनो ही बड़े हैं । हाँ, दर्जी-दर्जी में योग्यता कि दृष्टि से छोटा-बड़ापन अवश्य माना जा सकता है । ठीक इसी प्रकार योग्यतानुसार एक वर्ण के दो व्यक्तियों में छोटा बड़ापन हो सकता है परन्तु ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्रो में छोटे-बड़े यह क्या सम्बन्ध है, जबकि उन सबके गुण, कर्म और क्षेत्र भिन्न-२ हैं? वहाँ सभी वर्ण अपने-२ कर्तव्य पालन में बड़े है ।


कमल - क्या "वर्ण व्यवस्था" दूसरे देशों में पाई जाती है?


विमल - संसार के समस्त देशों मे गुण कर्मानुसार वर्णव्यवस्था है । यह और बात है कि वर्णो के नाम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र न होकर 'मिशनरी', 'मिलिटरी',  'मर्चेन्टस' औऱ 'मिनियल्स' रख लिए गये है । यह श्रम-विभाग अथवा 'कर्म-विभाग' का सिद्धान्त सारे संसार में अंतर्व्याप्त है । इसी का नाम वर्ण-व्यवस्था है।


कमल - मित्र, अब मै समझ गया आपकी बड़ी कृपा हुई । अच्छा यह तो बताओ कि नमस्ते कहाँ से चली?


विमल - इस विषय को कल समझाएंगे |


| ओ३म् |

नमस्ते कहाँ से चली?

| ओ३म् |

वैदिक सिद्धांतो पर आधारित

"दो मित्रो की बातें" - पंडित सिद्ध गोपाल कविरत्न

 

नमस्ते कहाँ से चली?




कमल - मित्र, यह नमस्ते कहाँ से चली और इसका अर्थ क्या है?



विमल - सृष्टि के आदि से लेकर महाभारत पर्यन्त सब मनुष्य परस्पर में नमस्ते ही करते थे । उनके पश्चात् जब अनेक मत मतान्तर और अनेक मजहब दुनियां में फैले, तो उन सबने अलग-२ शब्द नियत किए । किसी ने 'गुड मार्निंग' 'गुड नाइट' 'गुडबाए' किसी ने 'अस्लाम अलैकूल' 'वालेकम सलाम' 'आदाब अर्ज' आदि-२ अनेक शब्द विधर्मियों और विदेशियों ने कल्पित किए। जै शिव, जै हरी, जय गोविन्द, जय राधेश्याम, जै रामजी की, जय कृष्णजी की,  प्रणाम, जुहार आदि अनेक प्रयोग जारी किये | महाभारत के पहिले भूमण्डल पर आर्य लोगो का अखण्ड राज्य था लोग वैदिक धर्मी थे। परस्पर में नमस्ते ही किया करते थे । अब ऋषि दयानन्द की कृपा से लोग प्राचीन वैदिक सिद्धान्त को पुन: समझने लग गए है और परस्पर में नमस्ते करने लगे हैं । तुमने जो यह पूछा है की नमस्ते का क्या अर्थ है, सो नमस्ते का अर्थ है- 'मैं तुम्हारा मान्य करता हूँ आदर करता हूँ ।'



कमल - क्या वेदो में नमस्ते करना लिखा है? और जै रामजी की, जै श्री कृष्ण की करने में नुकसान ही क्या है?



विमल - वेदो में ही क्या बाल्मीकि रामायण, महामारत्त, उपनिषद, गीता आदि समस्त ग्रन्धों में नमस्ते ही लिखा हुआ मिलता है । कहीं भी जै रामजी की, जै कृष्ण जी की, जय शिव की आदि-२ लिखा हुआ नहीं मिलता । राम और कृष्ण स्वयं नमस्ते करते थे, क्योकि वे सब वैदिक धर्मी थे । मित्र! अगर तुमसे कोई यह पूछे कि राम और कृष्ण के उत्पन्न होने के पहिले लोग क्या करते थे तो इसका उत्तर क्या दे सकते हो? राम को उत्पन्न हुए लगभग १० लाख वर्ष हुए और कृष्ण को उत्पन्न हुए लगभग ५ हजार वर्ष हुए। सृष्टि तो इससे पहले की है । सृष्टि को उत्पन्न हुए तो करीब-२ अरब वर्ष हुए है । मैं तुमसे कह चुका हूँ यह सब साम्प्रदायिक लोगों की कल्पनायें हैं । तुम्हारा यह कहना कि जै रामजी की, जै कृष्ण जी की कहने में नुकसान क्या है? नुकसान एक नहीं अनेक है । प्रथम तो लोगों में साम्प्रदायिक भावना जागृत होती है। दूसरे इन प्रयोगों में परस्पर के सम्मान की कोई भावना नहीं । मानव समाज में तो कोई उम्र  में किसी से बड़ा है, कोई उम्र में छोटा है और कोई उम्र में बराबर । जब परस्पर में एक दूसरे से मिलना हो तो एक दूसरे के प्रति  आदर और सम्मान का भाव प्रकट करना मनुष्यता और सभ्यता का चिन्ह है । ऐसा न करके जै रामजी की, जय कृष्ण जी की, या जय शिव की करना शोभास्पद प्रतीत नहीं होता । फर्ज करो तुम्हें अपनी नानी, मामी या बुआ, फूफा के दर्शन हुए और उस समय उन सबसे तुमने 'जयरामजी की’ या 'जय कृष्णजी की’ कहा, तो ऐसा कहने में तुमने उनके सम्मान में क्या शब्द कहे? क्यों जय रामजी की बोलने में राम की जय और जय श्रीकृष्ण जी बोलने में कृष्ण के जय हुई । उनके आदर और सम्मान में तो कुछ नहीं हुआ । 'नमस्ते' कहने से यह बात निकली "मैं तुम्हारा मान करता हूँ|" मैं तुम्हारा आदर करता हूँ। आदर हर एक का करना चाहिए छोटों का छोटो जैसा, बड़ो का बड़ा जैसा । बच्चे का भी आदर है, और बड़े का भी आदर है, माता-पिता का भी आदर है, पुत्र-पुत्री का भी आदर है ।



कमल - राम की जय और कृष्ण की जय बोलने में राम और कृष्ण का नाम जुबान पर आता है?



विमल - नाम तो आता है पर क्या ये जरुरी है कि एक दूसरे के सम्मान या अदब के समय भी जय रामजी की और जयकृष्ण जी  की कहा जाये? क्या हर समय हर एक शब्द का बोलना उचित होता है? समय पर राम की और कृष्ण की जय बोलना भी अच्छा प्रतीत हो सकता है| जहाँ राम और कृष्ण का चरित्र वर्णन किया जा रहा हो, वहाँ कंस और रावण के मुकाबले पर राम-कृष्ण की जय बोलना अत्यन्त सुन्दर और शोभायमान प्रतीत होता है ।


कमल - क्या अच्छे शब्द हर समय नहीं बोले जा सकते हैं?


विमल - चाहे जितने ही सुन्दर शब्द हों, वे समय पर ही अच्छे मालूम देते हैं । देखो! 'राम नाम सत्य है' कितना सुन्दर वाक्य है। परन्तु हर समय अच्छा मालूम नहीं देता । यदि हर समय मालूम दे तो जरा विवाह के अवसर पर इसे बोलकर देखो फिर पता चले कि यह वाक्य कितना भयंकर है । इस वाक्य के बोलने में कितनी बुराइयों और गालियों पल्ले पड़ती हैं, जरा आजमा कर कभी देखो तो सही ।



कमल - क्या प्रत्येक को नमस्ते करना चाहिए? बेटा बाप को नमस्ते करे तो ठीक भी है, परन्तु बाप बेटे को नमस्ते करे, माँ बेटी को नमस्ते करे, छोटे बड़े को, बड़ा छोटे को, नीच ऊँच को, ऊँच नीच को, भला यह क्या बात हुई?



विमल - अच्छा यह बताओ, कि एक मनुष्य को अपनी माता से प्रेम करना चाहिए या नहीं?



कमल - हाँ, करना चाहिए ।



विमल - अपने भाई से भी प्रेम करना चाहिए या नहीं?



कमल - हाँ करना चाहिए ।



विमल - अपनी पुत्री से भी प्रेम करना चाहिए या नहीं?



कमल - हाँ, करना चाहिए!



विमल - अपनी पत्नी से भी प्रेम करना चाहिए या नहीं?



कमल - हाँ करना चाहिए ।



विमल - अब मैं पूछता हूँ सबसे ही प्रेम करना चाहिए, यह क्या बात हुई? माता से भी प्रेम, बहिन से भी प्रेम. पुत्री से भी प्रेम, पति से भी प्रेम, पिता, पुत्र और भाई से भी प्रेम । सबसे प्रेम ही प्रेम! सब के लिए एक ही शब्द । भला यह कहाँ की सभ्यता है की प्रत्येक से प्रेम करें?

कमल - पति, पुत्र, माँ, बहिन, बेटी आदि से प्रेम करने में भावनायें तो अलग-२ हैं?



विमल - इसी प्रकार नमस्ते करने की भावनायें अलग-२ हैं । जैसे माता-पिता से प्रेम करते हैं तो श्रद्धा प्रकट करते है, भाई-बहन से प्रेम करते हैं तो स्नेह प्रकट करते हैं, पति से प्रेम करते समय 'प्रणय' की भावना प्रकट करते हैं, वह भगवान से प्रेम करते हैं तो भक्ति प्रकट करते हैं । इसी प्रकार माता-पिता से नमस्ते करते हैं तो आदर प्रकट करते हैं । पुत्र-पुत्री से नमस्ते करते हैं तो आशीष या आशीर्वाद देते है । बराबर वालों से नमस्ते करते हैं तो प्रेम प्रकट करते है । बड़ो का आदर, बराबर वालों से प्रेम, छोटों पर दया यह सारी भावनायें 'नमस्ते' शब्द में मौजूद हैं । परन्तु इन समस्त भावनाओं की मन्शा एक ही हैं- प्रत्येक का आदर; प्रत्येक का सत्कार जैसे श्रद्धा, स्नेह, प्रणय आदि शब्द प्रेम के ही दूसरे रुप हैं, इसी प्रकार आदर, आशीर्वाद प्रेम आदि भी नमस्ते के दूसरे रुप हैं।



कमल - मित्र, आपने यह शंका तो निवारण कर दी। अब यह बतलाइये की मनुष्य को माँस खाना चाहिए या नहीं?



विमल - इस विषय पर कल विवेचन करेंगे अब तो देर हो रही है |


| ओ३म् |

Sunday, June 22, 2014

माँस खाना चाहिए या नहीं ?

| ओ३म् |


 वैदिक सिद्धांतो पर आधारित

"दो मित्रो की बातें" - पंडित सिद्ध गोपाल कविरत्न


माँस खाना चाहिए या नहीं ?



कमल - क्या मनुष्यों को माँस खाना चाहिए ?



विमल - नहीं ।



कमल - क्यों?



विमल - इसलिए कि माँस बिना प्राणियों को पीड़ा दिए प्राप्त नहीं होता और अपने स्वार्थ के लिए किसी को अकारण पीड़ा देना मनुष्य का धर्म नहीं है ।



कमल - इस दृष्टि से तो किसी को शाक, फल आदि भी न खाना चाहिए, क्योकि उनमें भी जीव हैं उनको भी पीड़ा पहुंचती है । जब वनस्पति में भी जीव हैं तो उनको भी दुख पहुंचेगा ही?



विमल - तुम्हारा प्रश्न तो यह था कि माँस खाना चाहिए या नहीं! मैंने उत्तर दे दिया कि नहीं खाना चाहिए । यहाँ यह प्रश्न नहीं है कि वृक्ष और वनस्पति में जीव हैं या नहीं? और अगर यही बात हो कि जिसमें जीव होता है उसमें माँस होता है, तो साबित करो, वृक्षों और शाक फलों में माँस कौन सा है जिसे न खाना चाहिए । सुनो! फलों और सब्जियों में 'रस' होता है, रक्त और माँस नहीं होता। क्योंकि कोई नहीं कहता, आम का माँस खाओ, नीबू का माँस खाओ, सेब, सन्तरे का माँस खाओ । सब यहीं कहते हैं, सन्तरे का रस लो, आम का रस लो । "रस" कही से और किसी का लो, चाहे सन्तरे का चाहे गन्ने का रस सेवन करने में कोई दोष नहीं है । दोष तो खून और माँस के खाने में है । जहाँ-जहाँ खून और माँस का सम्बन्ध है, वहाँ प्राणी को दु:ख होता है । जहाँ 'रस' हैं वहाँ दुःख का कोई सम्बन्ध नहीं है । किसी भी प्राणी का 'रस' निकालने पर उसे कोई दुःख नहीं होता । जैसे 'गोरस' अर्थात गाय का दूध, उसके निकालने में गाय को क्या दुःख है? यदि गाय के थन 'गोरस' अर्थात, दूध से भर रहे हों और न दुहा जाये तो देखा गया है गाय रंभाने लगती है, इसलिए कि दूध दुह लिया जाये । परन्तु जहाँ गाय या किसी जानवर का रक्त माँस निकाला जाता है वहाँ उसे दुख होता है ।



कमल - यदि फलों और सब्जियों में मांस नहीं है तो उनमें जो गूदा है वह क्या है? वहीं तो मांस है?



विमल - अगर फलों और सब्जियों का गूदा ही माँस है, तब तो हलवाई के रसगुल्ले और गुलाब जामुन को भी माँस कहा जा सकता है । क्योंकि गूदा तो उसमें भी होता ही है! परन्तु रसगुल्ले को कौन माँस कहेगा? माँस वस्तुत: वही है, जहाँ रक्त है । जहाँ रक्त नहीं वहाँ माँस कैसा ? वृक्षों और फल फूलों में रस है, रक्त नहीं । जब रक्त ही नहीं है तो माँस कहाँ से आयेगा? शरीर की धातुओं में सबसे पहली धातु 'रस' से रक्त बनता है और रक्त से माँस बनता है और माँस से अन्य धातुयें उत्पन्न होती हैं । आज जो भोजन किया जायेगा, उसका पचकर पहिले रस बनेगा । उस रस का फिर रक्त बनेगा और फिर माँस बनेगा | माँस तीसरी स्टेज है । जब कुदरत ने प्राणी के शरीर में रस का माँस बना दिया फिर किसी प्राणी के माँस को खाकर "रस" बनाना और फिर माँस बनाना सृष्टि क्रम के विरुद्ध भी है ।



कमल - तो फिर अण्डे खाने में तो शायद कोई भी दोष न होगा, क्योंकि अण्डे में तो माँस नहीं है, शायद 'रस' ही है?


विमल - अण्डा रज वीर्य के संयोग का पिण्ड है । उस पिण्ड से वही प्राणी उत्पन्न होते हैं जो रक्त माँस वाले हैं। किसी भी रक्त माँस वाले प्राणी की नींव को नष्ट करना क्या मनुष्य का धर्म है, वो भी स्वार्थ पूर्ति के लिए? हर्गिज नहीं ।



कमल - मै तो देखती हूँ कि दुनियाँ के थोड़े लोगों को छोड़कर सब माँस ही खाते हैं । इससे पता चलता है कि माँस खाना कोई बुराई की बात नहीं । कुछ ऐसा भी पता चला है, कुदरत ने मनुष्य को माँस भोजी बनाया है ।



विमल - यह कोई युक्ति नहीं है कि जिस काम को अधिक लोग करते हैं वह काम अच्छा ही होता है । संसार में झूठ बोलने वाले अधिक हैं सत्य बोलने वाले कम तो क्या झूठ बोलना अच्छी चीज है? दुनियाँ में पापी अधिक, पुण्यात्मा कम हैं तो क्या पापी अच्छे कहै जायेंगे? संसार में घास फूंस अधिक फल वाले वृक्ष उससे कम, चन्दन आदि के उससे भी कम । मिडिल वाले अघिक, एन्ट्रेन्स वाले उससे भी कम, बी०ए० वाले उससे भी कम और एम०ए० वाले उससे भी कम । तो क्या एम०ए० पास कम होने के कारण बुरे कहे जायेंगे । संसार में अच्छे और सच्चे लोग बहुत कम होते हैं । बुराई फैलते हुए देर नहीं लगती, भलाई के लिए कोशिशें करनी पड़ती है । कपड़े पर मैल बिना परिश्रम के ही लग जाता है । परन्तु धोने में परिश्रम करना पड़ता है । मनुष्यों को ईश्वर ने माँस भोजी नहीं बनाया, ये आदत मनुष्य ने अपने में डाल ली है । क्या संखिया अफीम जैसी चीजें खाने के योग्य हैं? परन्तु मनुष्य इन चीजो के भी आदी देखे जाते है ।



कमल - इसका क्या सबूत कि मनुष्य माँस भोजी नहीं हैं?



विमल - यह तो मनुष्य के शरीर की बनावट से ही जाहिर है । प्रथम तो मनुष्य के वैसे नाखून और दाँत नहीं हैं जैसे माँसाहारी प्राणियों के हैं । मनुष्य माँस को काट छांट कर, बनाकर, घी, मिर्च और मसाले मिलाकर पकाता है और अपनी जुबान और  दांतों के अनुकूल बनाने की चेष्टा करता है | माँसाहारी प्राणियों के नाखून अन्य प्राणियों के मारने-फाड़ने के अनुकूल है और उनकी जुबान कच्चे माँस का स्वाद लेने के अनुकूल है, मनुष्य के नहीं । दूसरे माँसाहारी जितने भी प्राणी हैं उन्हें पसीना नहीं आता। मनुष्य को पसीना आता है । तीसरे - माँसाहारी समस्त प्राणी पानी चप-चप कर पीते हैं मनुष्य घूँट-२ पानी पीता है । चौथे माँसाहारी प्राणियों की आँखें गोल होती हैं, परन्तु मनुष्य की आँखें बादाम जैसी चपटी हैं। एक जगह मैंने पढ़ा है, जितने मांसाहारी प्राणी हैं ये सन्तानोत्पादन की क्रिया में परस्पर जुड़ जाते है । बिल्ली, कुत्ता, शेर, भेडिया आदि सबको ऐसा देखा गया है । ऐसी बहुत सी युक्तियों दी जा सकतीं हैं जिनसे प्रकट है कि मनुष्य माँसाहारी प्राणियों में नहीं हैं ।



कमल - मांसाहारी वीर होते हैं माँस में बड़ी शक्ति होती है, कुछ लोगों का ऐसा ख्याल है |



विमल - माँसाहारी अधिकाँश में बेरहम और खूँखार हो सकते है, वीर नहीं । वीरता और चीज है, और बेरहमी और चीज । हाँ, तुम यह कह सकते हो कि माँस खाने वाले लाखों आदमी इतिहास में वीर हुए हैं परन्तु वह मांस का गुण नहीं था और न है । वह असल में शिक्षा और संगति का गुण है । मांस खाने से ही वीरता आती हो तो संसार के अधिकांश लोग मांस खाते सारे के सारे वीर ही दिखाई देते । वीर असल में वह है, जो देश और जाति के हितार्थ निस्वार्थ भाव से अन्याय का अन्त करने के लिए मैदान में डट जाये, चाहे प्राण ही भले चले जाये । परन्तु पीछे को कदम कभी न रखे । किसी के घर में आग लगा दी, किसी को लूट लिया, किसी पर धोखे से वार कर दिया, किसी को छुरा घुसेड़ दिया, किसी की स्त्री भगाली - क्या इसका नाम वीरता है? बहुतेरे गुण्डे इस प्रकार का कृत्य करते देखे जाते हैं क्या वह वीर है? हरगिज नहीं । वे पापी और अत्याचारी हैं ।



कमल - सुना जाता है माँस खाने से बल आता है । शेर, भेड़िये, चीते आदि जानवर कितने बलवान् होते हैं? वे माँस ही खाते है । शेर, हाथी तक को मार लेता है। इससे पता चलता है कि मांस में बहुत बल है ।



विमल - क्या माँस न खाने वाले जानवर बलवान् नहीं हैं । गाय, घोड़ा, साँड आदि जानवर क्या कम बलवान् हैं? संसार भर की मशीनों को शक्ति का परिमाण घोड़ो की शक्ति से ही तो लगाया जाता है | सूअर इतना बलवान् होता है कि सामने पड़ने पर शेर के भी दांत खट्टे कर देता है । दो शेरों के मध्य में एक सूअर पानी पी सकता है, परन्तु दो सुअरों के मध्य में एक शेर पानी नहीं पी सकता । शेर हाथी से ज्यादा बलवान नहीं है । कभी-२ जंगली मतवाला हाथी जब जंगल में घूमता है, सारे अन्य पशु डरकर भागते हैं । शेर हाथी पर काबू अपने दांतों और पंजों से पा लेता है, ताकत से नहीं । देखो! दो आदमी हों, एक शरीर में बहुत बलवान हो दूसरा शरीर में कमजोर | परन्तु कमजोर मनुष्य के पास भाल, बर्छी, पिस्तौल या बन्दूक हो तो वह बलवान पर काबू पा लेगा और उसे मार भी डालेगा। क्यों? इसलिए कि उसके पास शस्त्र की ताकत है । यदि कहीं शेर की तरह हाथी पर पैने दांत और नाखून होते और उसकी आँख छोटी न होती, तो संसार में हाथी किसी प्राणी को न रहने देता। हाथी, ऊँट, भैंस, भैसा आदि जानवर जो माँस नहीं खाते बड़े बलवान हैं । वे लाचार यदि हो जाते हैं तो शस्त्रों के अभाव में ही हो जाते है । तुम बल की बात क्या पूछते हो, बल तो सोना, चाँदी, लोहा, तांबा आदि धातुओं की एक एक रत्ती में भी मौजूद है वह मनों मांस में नहीं है। वह-वह औषधियाँ और वनस्पतियाँ मौजूद है जिनकी एक-एक मात्रा में अत्यन्त गर्मी और शक्ति मौजूद हूँ । मांस में क्या शक्ति है? 


कमल - जिन देशों में अनाज पैदा नहीं होता वहाँ के मनुष्य तो मांस पर ही गुजारा करते है । आइसलैण्ड अथवा उत्तरी ध्रुव के प्रदेशों में सुना जाता है मांस के ऊपर ही लोगों का जीवन निर्भर है | उनका तो मांस स्वाभाविक भोजन है |

विमल - अगर उन देशों के निवासियों का स्वाभाविक भोजन माँस हो तो वे मनुष्य न होंगे, या होंगे भी तो मनुष्य की आकृति से निम्न होंगे । उनके दांत और नाखून भी माँस को चीरने और फाड़ने  के अनुकूल ही होंगे । यदि हमारे जैसे ही वहाँ के नर नारी हैं तो माँसाहारी कैसे? क्योंकि हमारे दांत नाखून माँस खाने के योग्य ईश्वर ने नहीं बनाये हैं । हाँ, उन लोगों ने माँस खाने की आदत डाल ली होगी जहाँ मनुष्य पहुँच सकता है, वहाँ पर चीज पहुँच सकती है । यदि कहा जाये, वहाँ अनाज उत्पन्न नहीं किया जा सकता और वहाँ की पृथ्वी भी इस योग्य नहीं जो मानव जीवन की आवश्यक  वस्तुयें सम्पादित कर सके तो वहाँ मानव का बसना ही व्यर्थ है। वास्तव में माँसाहार की पुष्टि के सम्बन्ध में सब दलीलें थोती और व्यर्थ है ।



कमल - संसार में आर्थिक प्रश्न भी तो है, जहाँ अनाज कम होता है वहाँ मछली आदि बहुतायत से होती हैं । वहाँ के गरीब आदमियों का गुजारा मछली आदि जानवरों के माँस से होता है । यदि माँस न मिले तो संसार की आर्थिक समस्या कितनी खराब हो जाये?



विमल - संसार के किसी भी देश को देखे, जब भी प्रश्न उठता है, रोटी का प्रश्न उठता है । आज भी सारे संसार में रोटी का ही प्रश्न और समस्या है । दाल, शाक, चटनी, मुरब्बे, रायते, कढी और माँस का प्रश्न नहीं है । क्योंकि वह सब चीजें रोटी से लगाकर खाने की हैं, जायके और लज्जत की हैं जुबान को खुश करने की है, पेट भरने और शक्ति प्रदान करने की नहीं है । 'रोटी' मुख्य है और सब चीजे गौण हैं । शरीर का मुख्य आधार रोटी है, और यही संसार का प्रश्न है । आर्थिक प्रश्न सदैव रोटी से सम्बन्धित है, और रहेगा भी ।



कमल - अच्छा, माँस खाने में विशेष हर्ज ही क्या है?



विमल - माँसाहारी ईश्वर भक्त नहीं हो सकता क्योकिं तामसिक भोजन से विचार भी तामसिक ही होगे सात्विक नहीं । संसार में जो भी भगवान् के सच्चे भक्त बने वे या तो माँस खाते ही नहीं थे । यदि खाते भी थे तो बाद में खाना उन्होंने छोड़ दिया । तब उन्हें अन्तरात्मा की ज्योति का पता चला । यह ठीक है जो माँस नहीं खाते वह भी ईश्वर भक्त नहीं दिखते आडम्बरी दीखते हैं । उन लोगों में भी चोरी, दगा, फरेब, झूठ बोलना आदि दुर्गुण मौजूद है । पर जो आदमी पापों से रहित और निरामिष भोजी हैं वहीं ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है । अतएव मांस खाना अत्यन्त निषिद्ध है |



कमल - अच्छा मित्र, यह तो बताओ कि क्या ईश्वर से ही समस्त सृष्टि बनी है?



विमल - यह कल बताऊँगा ।

| ओ३म् |

क्या समस्त सृष्टि ईश्वर से बनी है?

| ओ३म् |

वैदिक सिद्धांतो पर आधारित 

"दो मित्रो की बातें" - पंडित सिद्ध गोपाल कविरत्न


क्या समस्त सृष्टि ईश्वर से बनी है?


कमल - क्या यह सारा संसार ईश्वर का ही रूप है?
 

विमल - नहीं, यह संसार प्रकृति का रुप है! ईश्वर तो रुप से रहित है ।


कमल - बड़े-२ बुद्धिमान और दार्शनिक विद्वान यही कहते हैं कि सारा संसार ईश्वर से ही बना है । ईश्वर से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी और पृथ्वी से अन्न, औषधियाँ तथा अनेक प्रकार के प्राणी उत्पन्न हुए हैं ।



विमल - यह बात गलत है, ईश्वर सृष्टि का उत्पत्ति कर्ता है स्वयं कार्य नहीं है । सृष्टि उत्पत्ति के ३ ही कारण है और तीनों ही पदार्थ अनादि हैं- ईश्वर, जीव, प्रकृति । यह तीनों पदार्थ अनादि हैं । ईश्वर निमित्त कारण हैं, प्रकृति उपादान कारण है और काल, दिशा आदि साधारण कारण हैं, क्योंकि सृष्टि के समस्त कार्यो में यह सामान्य हैं । निमित्त कारण वह है जिसके बनाने से कोई चीज़ बने न बनाने से न बने । उपादान कारण वह है जिसके होने से कोई चीज बने, न होने से न बने | जैसे सुनार ने जेवर बनाया । अब सुनार इसमें कर्ता यानी निमित्त कारण हुआ और सोना उपादान कारण हुआ । सुनार के बनाने से जेवर बने न बनाने से न बनते, इसी तरह सोने के होने से जेवर बने न होने से न बनते । देखो! यदि ईश्वर से आकाश बनता तो आकाश में 'शब्द' गुण है। ईश्वरका गुण शब्द है नहीं, तो आकाश में शब्द कहाँ से आया? कारण के गुण कार्य में अवश्य आते हैं । सोने से जेवर बनाये तो सोने के गुण जेवर में अवश्य आयेंगे | जब ईश्वर में ही शब्द नहीं है, आकाश में कहाँ से आ जाएगा? अभाव से भाव भी नहीं होता । अतएव सिद्ध है, ईश्वर से आकाश नहीं बना । इसी प्रकार आकाश से वायु नहीं बनी । क्योंकि वायु का धर्म स्पर्श है और आकाश में स्पर्श नहीं है तो स्पर्श गुण वायु में कहाँ से आ गया? वायु से अग्नि नहीं बनी, क्योंकि अग्नि का गुण रुप है और रुप वायु में है नहीं, फिर अग्नि में कहाँ से आ गया? इस प्रकार समस्त तत्वों को समझ लो । यह सब तत्व, सत, रज, तम वाली मूल प्रकृति से ही बने हैं और इन्हें निमित्त कारण परमात्मा ने ही बनाया है।



कमल - परमात्मा सृष्टि बनाने में जब प्रकृति का सहारा लेता
 है, तो प्रकृति का मुहताज हुआ- क्योंकि वह बिना प्रकृति के संसार
नहीं बना सकता?



विमल - परमात्मा प्रकृति का सहारा नहीं लेता, बल्कि प्रकृति को ही संसार के रुप में बिना किसी का सहारा लिए कर देता है । अपना कार्य करने में किसी साधन का मुहताज नहीं है । प्रकृति साधन नहीं बल्कि 'कर्म' है जिस पर परमात्मा की क्रिया का फल गिरता है । जैसे मोहन ने सोहन को मारा, तो मोहन कर्ता है, सोहन 'कर्म' है और मारना क्रिया है । कोई कहने लगे कि मोहन सोहन को मारने में सोहन का मुहताज है । मैं पूछता हूं यह कहना क्या अक्लमन्दी की बात है?  क्या बिना मोहन के सोहन को मार देना कहना ठीक बन भी सकता था? यदि मै कहूँ मैंने कमल को पाँच रुपये दिये हैं तो कोई मुझसे कहने लगे, तुम कमल को रुपये देने में रुपयों की मुहताज कैसे? शायद तुम्हारा मतलब यही है, कि मरने वाला न हो और ईश्वर उसे मार दे । खाने वाला न हो और ईश्वर उसे खिला दे, रोने वाला न हो और ईश्वर रुलादे । प्रकृति न हो और प्राकृतिक जगत् बना दे । भला इसे पागलपन के सिवाय और क्या कहा जायेगा?



कमल - मैं तो सुनता हूँ, सृष्टि बनने के पूर्व ईश्वर ही ईश्वर था और कोई पदार्थ नहीं था । उसने अपनी इच्छा से दुनिया बनाई है ।



विमल - अच्छा ईश्वर ने सृष्टि क्यो बनाई? अपने लिए या अन्य के लिए? यदि कहो, अपने लिए तो मालूम हुआ, सृष्टि की जरूरत ईश्वर को थी । जिसमे जरूरत है उसे पूर्ण नहीं कहा जा सकता है । क्योकि जरुरत का होना ही अपूर्ण होने का सबूत है । यदि कहो जीवों के लिए बनाई तो ईश्वर के साथ जीव भी मानने पड़ेगे । फिर ईश्वर ही ईश्वर था यह बात गलत हो जायेगी ।



कमल - उसने अपनी लीला दिखाने के लिए सृष्टि को रचा है ।



विमल - उसने अपनी लीला किसे दिखाई?



कमल - अपने आपको, अपनी लीला दिखता है ।



विमल - अपने आपको अपनी लीला दिखाता है?



कमल - अपने आनन्द के लिये लीला दिखाता है ।



विमल - तो सृष्टि रुप लीला दिखाने के पहले उसमें वह आनन्द था या नहीं । यदि था, तो लीला दिखाने से आनन्द क्या हुआ? यदि नहीं था तो उसमें लीला के आनन्द की कमी तो स्वत: ही सिद्ध हो गई और जब लीला दिखाई तो सृष्टि रुप लीला के आनन्द की परमात्मा में वृद्धि हुई । जिसमें कमी और वृद्धि का दोष होता है, उस पदार्थ के गुण अनादि अनन्त नहीं होते। और जब गुण ही अनादि अनन्त नहीं है तो उनका गुणी जो ईश्वर है, अनादि अन्त कैसे हो सकत्ता है?



कमल - अच्छा, मैं यह मान लूँ की लीला दिखाना उसका स्वभाव है ।



विमल - ऐसे मानने में राग, द्वेष, सुधा, तृषा, भय, शोक, सुख, दुख, जन्म, मरण, अन्याय, चोरी, हिंसा, व्यभिचार, आदि गुण, अवगुण सब ईश्वर की लीला के ही धर्म मानने पडेंगे, क्योंकि सृष्टि रुपी लीला में यह सारी बाते है । फिर संसार में पाप, पुण्य, दुराचार, सदाचार, धर्म-अधर्म कोई पदार्थ न रहेगा। सब परमात्मा के स्वभाव के अंग बन जायेंगे । फिर तो वेद शास्त्र, यम नियम आदि साधन सब व्यर्थ हो जायेंगे | मानव जीवन का उददेश्य भी कोई न रहेगा। किसकी प्राप्ति के लिए घोर तपस्याये की जायें और कौन उन्हें करे, जब कि ईश्वर ने अपने आपको अपने स्वभाव से ही लीला दिखाई है । फिर कौन पापी और कौन पुण्यात्मा ? कौन सा कर्म और कौन-सा कर्मफल? सब व्यर्थ!



कमल - अच्छा आपके सिद्धान्त से परमात्मा ने सृष्टि क्यों बनाई?



विमल - जीवों के कल्याण के लिए परमात्मा सृष्टि की रचना किया करता है । वह न्यायी और दयालु है । उसके न्याय और दया का प्रकाशन सृष्टि उत्पत्ति द्वारा ही होता है उसका अपना कोई प्रयोजन नहीं, दया और न्याय करना उसका स्वभाव है ।



कमल - जब परमात्मा ने जीवो के कल्याण के लिये सृष्टि बनाई तो उसमें दुःख सुख और भलाई बुराई क्यों  है?



विमल - सृष्टि में जो भी भलाई बुराई मालूम देती है और सुख दुख मालूम देता है वह वास्तव में जीवों के अपने कर्मों  का परिणाम है । जीव अपनी अज्ञानता वश सृष्टि में दुख उठाता है । अन्यथा न सृष्टि में कोई बुराई है और न कोई दुख है । जीव अपनी अल्पज्ञता के कारण विपरीत कर्म करके दुख उठाते हैं और परमात्मा के न्यायानुसार अनेक योनियों धारण करते हैं । परमात्मा दुःख किसी को नहीं देता । दुख का कारण अज्ञान है, वास्तविकता को न समझना है |



कमल - क्या जीव परमात्मा ने नहीं बनाये?



विमल - जीव अनादि है ।



कमल - जब जीव और प्रकृति ईश्वर ने नहीं बनाये तो उसने इन पर अधिकार क्यों किया?



विमल - यह प्रश्न ऐसा ही है, जैसे कोई पाठशाला में विद्यार्थियों को देखकर कहे कि जब मास्टर ने इन विद्यार्थियों को पैदा नहीं किया तो इन पर अपना अधिकार क्यों रखता है जब प्रकृति अज्ञ, जीव अल्पज्ञ और परमात्मा सर्वज्ञ है, तो दोनों वस्तुओं पर सर्वज्ञ का प्रभाव स्वभाव से रहेगा। जैसे पाठशाला में विद्यार्थियों पर मास्टरों का नियन्त्रण होना विद्यार्थियों की उन्नति का कारण है वैसे ही सृष्टि रुप पाठशाला में जीवों का ईशवराधीन रहना जीवों की उन्नति का कारण है । परमात्मा रुपी मास्टर के वेद ज्ञान द्वारा जीव लौकिक और पारलौकिक उन्नति सम्पादित करते हैं ।



कमल - यदि यह मान लें कि जीवों को भी परमात्मा ने बनाया है, तो क्या आपत्ति आती है ।


विमल - ऐसा मानने पर जीव कर्म करने में स्वतन्त्र न रहेगा दूसरे भले बुरे कर्मों की जिम्मेदारी ईश्वर पर ही रहेगी । जीव पाप का भागी न माना जायेगा, क्योकि जीव को परमात्मा ने बनाया और भले बुरे कर्म करने की उसमें योग्यता रखी, तभी भले बुरे कर्म किये तो उसका अपना दोष क्या हुआ? जीव को बनाने के पहिले उसमें यह योग्यता रखता कि बुरे कर्म वह कर ही न सकता । अतएव जीव अनादि है और कर्म करने में स्वतन्त्र है और परमात्मा की व्यवस्था से कर्म फल भोगने में परतंत्र है ।



कमल - कुछ लोग कहते है, जीव ब्रह्म का ही अंश है?



विमल - अंश, अंशी का भाव सावयव यानी साकार और अनित्य पदार्थों में होता है । जीव ब्रह्म दोनों तत्व अनादि हैं ।

कमल - कुछ कहते हैं, जीव ब्रह्म से ही बना है और अन्त में ही ब्रह्म में लय हो जायेगा ।



विमल - ऐसा मानने पर जीव अनादि और सनातन नहीं रहता । हमेशा कार्य कारण में लय होता है, जैसे मिट्टी रुप कारण में घड़ा रुपी कार्यं लय हो जाता है । जीव ब्रह्म का कार्य नहीं है । वह स्वतन्त्र और नित्य है । जो नित्य है वह अपनी सत्ता खोकर किसी में लय कैसे हो जायगा ।



कमल - जीव है तो ब्रह्म ही, अपने को अज्ञानता से जीव समझता है?




विमल - इससे तो यह सिद्ध होता है, कि ब्रह्म में भी अज्ञान है । जब ब्रह्म ही अज्ञानता के वश जीव बना है तो फिर ज्ञान किससे प्राप्त करेगा? ब्रह्म से तो नहीं कर सकता, क्योकि ब्रह्म तो अज्ञान के काबू में आया हुआ है ।



कमल - क्या ब्रह्म से जीव नही बना? क्या अन्त में जीव ब्रह्म न बनेगा?




विमल - जो बनता है, वह ब्रह्म नहीं होता, ब्रह्म तो बे बनी वस्तु है, इसी तरह जीव भी नहीं बनता तभी तो दोनों तत्व नित्य हैं ।



कमल - कुछ लोग कहते हैं, यह संसार मिथ्या है ब्रह्म ही सत्य है, माया को अनिर्वचनीय कहते हैं । क्योंकि माया तीन काल में एक रस रहती नहीं, इसलिए सत् उसे कह नहीं सकते । और असत् इसलिए नहीं कहते कि उसका संसार में काम दिखाई देता है ।



विमल - संसार न सत् है न असत् है बल्कि अनित्य है, अर्थात् बदलने वाला है जो लोग माया को अनिर्वचनीय कहते हैं उनसे पूछना चाहिए की माया को किसी प्रमाण से मानते हो या बिना प्रमाण के ही मानते हो? यदि प्रमाण से मानते हो तब तो माया प्रमेय हो गई क्योंकि प्रमाता ने प्रमाण से जान लिया, उसका निर्वचन हो गया । यदि कहे बिना प्रमाण को मानते हैं तो 'माया है' यह जाना कैसे? इसलिए माया अर्थात् प्रकृति के कार्य अनित्य हैं और प्रकृति नित्य है ।


कमल - कुछ कहते है यह संसार भ्रम है, वास्तव में इसकी सत्ता नहीं है, जैसे रस्सी का साँप दिखाई देता है, सीप की चाँदी दिखाई देती है, इसी प्रकार ब्रह्म में माया की प्रतीति होती है, वास्तव में माया नहीं है । सीप में चाँदी नहीं, रस्सी में साँप नहीं, तो भी भ्रम हो जाता है, इसी प्रकार ब्रह्म में ही माया का भ्रम हो रहा है ।


विमल - यह भ्रम हो किसे रहा है, जब ब्रह्म के सिवाय और कोई चीज ही नहीं? क्या ब्रह्म में ब्रह्म को ही ब्रह्म का भ्रम हो रहा है! क्योंकि भ्रम किसी में किसी का किसी को होता है । दुसरे भ्रम समान वस्तुओं में होता  है जैसे रस्सी में साँप का भ्रम हो जाता है घड़े में नहीं, सीप में चाँदी का भ्रम हो सकता है गुलाब जामुन का नहीं । जब ब्रह्म चैतन्य और जगत् जड़ है तो असमान होने से भ्रम कैंसे होगा ? ब्रह्म निराकार जगत् साकार,  ब्रह्म नित्य जगत् अनित्य, ब्रह्म सर्वज्ञ जगत् अज्ञ, फिर भ्रम होगा कैसे?


कमल - क्या ब्रह्म के अलावा और वस्तुएँ भी हो सकती हैं?


विमल - यदि और वस्तुऐं न हो तो ब्रह्म कहा किसे जाये ब्रह्म का अर्थ है, बडा, जब छोटा ही नहीं तो बड़ा कैंसा? जब कड़वा ही नहीं तो मीठा कैसा ? दूसरे ब्रह्म आत्मा है, जिसका अर्थ है व्यापक । यदि व्याप्य न हो तो व्यापक होगा कैसे?


कमल - अच्छा दोस्त, इस विषय को अब यहीं समाप्त करते है | आपकी युक्तियों से यहीं समझ में आता है कि ब्रह्म, जीव और प्रकृति के नित्य मानने में ही सारी समस्यायें हल होती हैं । और कोई 'वाद' इस सृष्टि का सम्यक समाधान नहीं कर सकता । आपकी बडी कृपा हुई जो आपने इतने दिनों तक वार्तालाप करके मेरे समस्त संशय निवारण कर दिये । मैं आपका उपकार कभी न भूलूँगा ।

। ओ३म् ।

Sunday, February 2, 2014

VOTER ID CARD - YOUR VOICE AGAINST CORRUPTION


How to Get Your Voter ID Card?

Register Online at Official Website of Chief Electoral Officer, Delhi 


For other States, please choose the appropriate link from 

http://eci.nic.in/eci_main1/Links.aspx


  
Fill Form 6 -  New Voter / Change of Assembly Constituency

Fill Form 8A - Change of Address within the same Assembly Constituency



Proof of Age (if you are between 18 to 21):  Birth Certificate issued by the Municipal Authorities

Proof of Residence: 


a) Bank / Kisan / Post Office current Pass Book, or

b) Applicant's Ration Card / Passport / Driving License / Income Tax Return filed or Assessment Order, or

c) Latest Water / Telephone / Electricity / Gas Connection Bill for that address, either in the name of the applicant or that of his / her immediate relation like parents etc. or

d) Postal department's post received / delivered in the applicant's name at the given address.

Students living in Hostel/PG need to fill a Declaration (click here)  & attach with Form 6.



 



  • Document Upload is Optional & can be given to Booth Level Officer (BLO) during their Verification visit.
  • Nothing additional is to be done to cancel the previous Voter ID card.